Sunday, June 13, 2010

Remember this one? -I love the moral it gives

शक्ति और शमा
रामधारी सिंह दिनकर

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ सुयोधन तुमसे
कहो कहाँ कब हारा?

क्षमाशील हो ॠपु-सक्षम
तुम हुए विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसका क्या जो दंतहीन
विशराहित विनीत सरल हो
I Love this one in bold...

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे
बैठे पढते रहे छंद
अनुनय के प्यारे प्यारे

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्र्र्हन की
बंधा मूढ़ बंधन में

सच पूछो तो शर में ही
बस्ती है दीप्ति विनय की
संधिवचन संपूज्य उसीका
जिसमे शक्ति विजय की

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग

Wednesday, June 02, 2010

Read Something Wonderful on Silence


"Sticks and stones are hard on bones, aimed with angry art; words can sting like anything, but Silence Breaks the Heart. "
-- Phyllis McGinley

Those who are familiar with this blog would have read the post titled 'The Golden Virtue', written ages ago. Recently, I read this wonderful quotation which reminded me of the same... http://sunanda-offthebeatenpath.blogspot.com/2006/11/golden-virtue.html- its postscript rather.

It is so true that silence of a loved one leaves you feeling wretched, guilty and miserable. It is the penultimate tactic under emotional blackmail/violence.
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